संध्या न करने से दोष



जिसने संध्या का ज्ञान नहीं किया, जिसने संध्या की उपासना नहीं की वह (द्विज) जीवित रहे, शूद्र-सम रहता है और मृत्यु के बाद कुत्ते आदि की योनि को प्राप्त करता है-


संध्या येन न विज्ञाता संध्या येनानुपासिता । जीवमानो भवेच्छूद्रो मृतः श्वा चाभिजायते।।

(दे.भाग. ११-१६-७)

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदि संध्या नहीं करें, तो वो अपवित्र है और उन्हें किसी पुण्यकर्म के करने का फल प्राप्त नहीं होता।

संध्याहीनो ऽ शुचिर्नित्यमनर्हः सर्वकर्मसु। यदन्यत् कुरूते कर्म न तस्य फलभाग्भवेत्।।

(दक्ष स्मृ. २-२७)

सूर्य और तारों से रहित दिन-रात की संधि को तत्वदर्शी मुनियों ने संध्याकाल माना है-

अहोरात्रस्य या संधिः सूर्यनक्षत्रवर्जिता। सा तु संध्या समाख्याता मुनिभिस तत्वदर्शिभिः ।।

संध्यास्तुति

(आचारभूषण ८९)

ब्राह्मणरूपी वृक्ष का मूल संध्या है, चारों वेद, चार शाखाएँ हैं, धर्म और कर्म पत्ते हैं। अतः मूल की रक्षा यत्न से करनी चाहिये। मूल के छिन्न हो जाने पर वृक्ष और शाखा कुछ भी नहीं रह सकते-

विप्रो वृक्षो मूलकान्यत संध्या
 वेदाः शाखा धर्मकर्माणि पत्रम्।
तस्मान्मूलं यत्नतो रक्षणीयं
 छिन्ने मूले नैव वृक्षो न शाखा।।

(देवीभाग. ११-१६-६)


समय पर की गयी संध्या इच्छानुसार फल देती है, और बिना समय की की गयी संध्या वन्ध्या स्त्री के समान होती है-

स्वकाले सेविता संध्या नित्यं कामदुघा भवेत्। अकाले सेविता सा च संध्या वन्ध्या वधूरिव ।।

(मित्रकल्प)

प्रातःकाल में तारों के रहते हुए, मध्याह्नकाल में जब सूर्य आकाश के मध्य में हों, सायंकाल में सूर्यास्त के पहले ही इस तरह तीन प्रकार की संध्या करनी चाहिये-

प्रातः संध्या सनक्षत्रां मध्याह्ने मध्यभास्कराम् ।। ससूर्या पश्चिमां संध्यां तिस्त्रः संध्या उपासते।

(दे.भा. ११/१६/२-३)

सायंकाल में पश्चिम की तरफ मुँह करके जब तक तारों का उदय न हो और प्रातःकाल में पूर्व की ओर मुख करके जब तक सूर्य का दर्शन न हो, तबतक जप करता रहे-

जपन्नासीत सावित्रीम्प्रत्यगातार कोदयात्।
 संध्या प्राक् प्रातरेवं हि तिष्ठदासूर्यदर्शनात्।

(पा.स्मृ. २।२४-२५)


गृहस्थ तथा ब्रह्मचारी गायत्री के आदि में 'ॐ' जप करें, और अन्त में 'ॐ' का उच्चारण न करें, क्योंकि ऐसा करने से सिद्धि नहीं होती है।

गृहस्थो ब्रह्मचारी च प्रणवाद्यामिमां जपेत्।
 अन्ते यः प्रणवं कुर्यान्नासौ सिद्धिम वाप्नुयात् ।।

(याज्ञवल्क्य स्मृ. आचाराध्याय २४।२५ बालम्भट्टी)

जपके आदि में चौंसठ कलायुक्त विद्याओं तथा सम्पूर्ण ऐश्वर्यों का सिद्धिदायक 'गायत्री-हृदय' का तथा अन्त में 'गायत्री कवच' का पाठ करें। (यह नित्य-संध्या में आवश्यक नहीं है, करे तो अच्छा है।)

चतुष्षष्टिकलाविद्या सकलैश्वर्यसिद्धिदा। 
जपारम्भे च हृदयं जपान्ते कवचं पठेत् ।।

घर में संध्या-वन्दन करने से एक, गो-स्थान में सौ, नदी किनारे लाख तथा शिव के समीप में अनन्त गुना फल होता है-

गृहेषु तत्समा संध्या गोष्ठे शतगुणा स्मृता ।
 नद्यां शतगुणा प्रोक्ता अनन्ता शिवसंनिधौ ।।

(लघुशातातप स्मृ. ११४)

पैर धोने से, पीने से और संध्या करने से बचा हुआ जल श्वान के मूत्र के समान हो जाता है, उसे पीने पर चान्द्रायण-व्रत करने से मनुष्य पवित्र होता है। इसलिए बचे हुए जल को फेंक दें-

पादशेषं पीतशेषं संध्याशेषं तथैव च 
शुनो मूत्र समं तोयं पित्वा चान्द्रायणं चरेत्।।


शताक्षर गायत्री मंत्र-

सौ अक्षरों की गायPujaत्री का जाप करने के बाद गायत्री मन्त्र का जाप करना चाहिये-

ॐ भूर्भुव स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात् ।।

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्द्धनम्। उ॒र्ध्वारुकर्मिव बन्ध॑नान्मृत्योर्मुक्षीय॒ माऽमृता॑त् ॥

ॐ जा॒तवे॑दसे सुनवाम॒सोम॑मरातीय॒तो निर्दहाति॒वेद॑ः। सर्नः पर्षदति दुर्गाणि विश्श्या॑ ना॒वेवसिन्धुं दुरि॒तात्य॒ग्निः ।।
राघवराघवपूजा 

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