१. श्रीसोमनाथ

१. श्रीसोमनाथ

यह ज्योतिर्लिङ्ग सोमनाथ नामक विश्वप्रसिद्ध मन्दिरमें स्थापित है। यह मन्दिर गुजरात प्रान्तके ठियावाड़ क्षेत्रमें समुद्र के किनारे स्थित है। पहले यह क्षेत्र प्रभामक्षेत्रके नामसे जाना जाता था। यहीं भगवान् श्रीकृष्णाने जग नामक व्याधके बाणको निमित्त बनाकर अपनी लीलाका संवरण किया था। यहाँके ज्योतिर्लिङ्गकी कथा पुराणोंमें

इस प्रकार दी हुई है


दक्ष प्रजार्थकी सत्ताईस कन्याएँ थीं। उन सभीका विवाह चन्द्र देवताके साथ हुआ था। किन्तु चन्द्रमाका समस्त अनुराग उनमें एक केवल रोहिणीके प्रति ही रहता था। उनके इस कार्यसे दक्ष प्रजापतिकी अन्य कन्याओंको बहुत कष्ट रहता था। उन्होंने अपनी यह व्यथा कथा अपने पिताको सुनायी। दक्ष प्रजापतिले उसके लिये चन्द्रदेवको बहुत प्रकारसे समझाया। किन्तु रोहिणीके वशीभूत उनके हृदयपर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। अन्ततः दक्षने कुद्ध होकर उन्हें क्षयी हो जानेका शाप दे दिया। इम शापके कारण चन्द्रदेव तत्कायन क्षय हो गये। उनके क्षयग्रस्त होते ही पृथ्वीपर सुधा शीतलता वर्षणका उनका सारा कार्य रुक गया। चारों ओर जाहि-त्राहि मच गयी। चन्द्रमा भी बहुत दुःखो और चिन्तित थे। उनकी प्रार्थना सुनकर इन्द्रादि देवता तथा वसिष्ठ आदि ऋषिगण उनके उद्धारके लिये पितामह ब्रह्माजीके पास गये। सारी बातोंको सुनकर ब्रह्माजीने कहा- चन्द्रमा अपने शाप-विमोचनके लिये अन्य देवोंके साथ पवित्र प्रभासक्षेत्रमें जाकर मृत्युञ्जयभगवान्‌की आराधना करें। उनकी कृपासे अवश्य ही इनका शाप नष्ट हो जायगा और ये

उनके कंधनानुसार चन्द्रदेवने मृत्युभगवान्‌की आराधनाका कार्य पूरा किया। उन्होंने घोर तपस्या करते हुए दस करोड़ यु मन्त्रका जप किया। इसमें प्रमत्र होकर मृत्युञ्जय भगवान् शिवने उन्हें अमरत्वका वा प्रदान किया। उन्होंने कहा- चन्द्रदेव तुम शोकन करो। मो वरसे तुम्हारा शाप मोचन तो होगा ही, साथ ही साथ प्रजापति के वचनोंकी रक्षा भी हो जायगी। कृष्ण पक्ष प्रतिदिन तुम्हारी एक-एक कता क्षीण होगी, किन्तु पुनः शुक्ल पक्ष उभी क्रये तुम्हारी एक-एक कला जाया करेगी। इस प्रकार प्रत्येक पूर्णिमाको तुझे पूर्ण रहेगा। चन्द्रमाको पिलापितामह ब्रह्माजीके इस वालों प्राणी प्रसत्र हो उठे। सुधाकर चन्द्रपुर दमों दिशाओं कार्य पूर्ववत् करने लगे।

शापमुक्त होकर चढदेवने अन्य देवताओंके साथ मिलकर मृत्यु भगवान्‌मे प्रार्थना की कि आप माता पार्वतीजी के साथ सटाके लिये प्रक उद्धारार्थ यहाँ निवास करें। भगवान्की प्रार्थनाको स्वीकार कर ज्योतिर्लिङ्गके रूपमें माता पार्वतीजीके साथ भीसे यहाँ हने लगे।

पावन प्रभासक्षेत्रमें स्थित इस सोमनाथ ज्योतिक श्रीम‌द्भागवत तथा स्कन्दपुराणादिमें विस्तार बतायी गयी है। नाका एक नाम सोम भी है. उन्होंने भगवान् शिवको ही अपन मानकर यहाँ तपस्या की थी। अतः इस ज्योतिलिङ्गको मोमनाथ कहा जाता है। इसके दर्शन, पूजन, आराधनमें भलाके जन्म-जन्मानासपातक और दुष्कृत्य विरह हो जाते हैं। वे भगवान् शिव और माता पार्वतीकी अध्यकृपाका पात्र वन जाते हैं। मोक्षका मार्ग उनके लिये सहज ही सुलभहो जाता है। उनके लौकिक पारलौकिक सारे कृत्य सफल हो जाते हैं।


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