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पटना में वैदिक पंडित

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ओम जय जगदीश हरे , स्वामी! VishnuJi ki Aarti Om jai Jagdish Hare

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जय जगदीश हरे। . भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ ओम जय जगदीश हरे। . जो ध्यावे फल पावे, दुःख विनसे मन का। स्वामी दुःख विनसे मन का। . सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥ ओम जय जगदीश हरे। . मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं मैं किसकी। स्वामी शरण गहूं मैं किसकी। . तुम बिन और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ओम जय जगदीश हरे। . तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी। स्वामी तुम अन्तर्यामी। . पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ओम जय जगदीश हरे। . तुम करुणा के सागर, तुम पालन-कर्ता। स्वामी तुम पालन-कर्ता। . मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ओम जय जगदीश हरे। . तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति। स्वामी सबके प्राणपति। . किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय जगदीश हरे। . दीनबन्धु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे। स्वामी तुम ठाकुर मेरे। . अपने हाथ उठा‌ओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ओम जय जगदीश हरे। . विषय-विकार मिटा‌ओ, पाप हरो देवा। स्वमी पाप हरो देवा। . श्रद्धा-भक्ति बढ़ा‌ओ, संतन की सेवा॥ ओम जय जगदीश हरे। . श्री जगदीशजी की आरती, जो कोई नर गावे। स्वामी जो कोई नर गावे। . कहत शिवानन्द स्वामी, सुख संपत्ति पावे॥ ओम जय जगदीश हरे। . ...

अग्नि की उत्पति कैसे हुई

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अग्निदेवता यज्ञके प्रधान अङ्ग हैं। ये सर्वत्र प्रकाश करनेवाले एवं सभी पुरुषार्थोंको प्रदान करनेवाले हैं। सभी रत्र अग्निसे उत्पन्न होते हैं और सभी रत्नोंको यही धारण करते हैं। वेदोंमें सर्वप्रथम ऋग्वेदका नाम आता है और उसमें प्रथम शब्द अग्रि ही प्राप्त होता है। अतः यह कहा जा सकता है कि विश्व-साहित्यका प्रथम शब्द अग्रि ही है। ऐतरेय आदि ब्राह्मणग्रन्थोंमें यह बार-बार कहा गया है कि देवताओंमें प्रथम स्थान अग्रिका है। आचार्य यास्क और सायणाचार्य ऋग्वेदके प्रारम्भमें अग्निकी स्तुतिका कारण यह बतलाते हैं कि अग्रि ही देवताओंमें अग्रणी हैं और सबसे आगे-आगे चलते हैं। युद्धमें ये सेनापतिका काम करते हैं। इन्हींको आगे कर युद्ध करके देवताओंने असुरोंको परास्त किया था। पुराणोंके अनुसार इनकी पत्नी स्वाहा हैं। ये सब देवताओंके मुख हैं और इनमें जो आहुति दी जाती है, वह इन्हींके द्वारा देवताओंतक पहुँचती है। केवल ऋग्वेदमें अग्निके दो सौ सूक्त प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेदमें भी इनकी स्तुतियाँ प्राप्त होती कहते हैं कि हैं। ऋग्वेदके प्रथम सूक्तमें अग्निकी प्रार्थना...

१. श्रीसोमनाथ

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१. श्रीसोमनाथ यह ज्योतिर्लिङ्ग सोमनाथ नामक विश्वप्रसिद्ध मन्दिरमें स्थापित है। यह मन्दिर गुजरात प्रान्तके ठियावाड़ क्षेत्रमें समुद्र के किनारे स्थित है। पहले यह क्षेत्र प्रभामक्षेत्रके नामसे जाना जाता था। यहीं भगवान् श्रीकृष्णाने जग नामक व्याधके बाणको निमित्त बनाकर अपनी लीलाका संवरण किया था। यहाँके ज्योतिर्लिङ्गकी कथा पुराणोंमें इस प्रकार दी हुई है दक्ष प्रजार्थकी सत्ताईस कन्याएँ थीं। उन सभीका विवाह चन्द्र देवताके साथ हुआ था। किन्तु चन्द्रमाका समस्त अनुराग उनमें एक केवल रोहिणीके प्रति ही रहता था। उनके इस कार्यसे दक्ष प्रजापतिकी अन्य कन्याओंको बहुत कष्ट रहता था। उन्होंने अपनी यह व्यथा कथा अपने पिताको सुनायी। दक्ष प्रजापतिले उसके लिये चन्द्रदेवको बहुत प्रकारसे समझाया। किन्तु रोहिणीके वशीभूत उनके हृदयपर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। अन्ततः दक्षने कुद्ध होकर उन्हें क्षयी हो जानेका शाप दे दिया। इम शापके कारण चन्द्रदेव तत्कायन क्षय हो गये। उनके क्षयग्रस्त होते ही पृथ्वीपर सुधा शीतलता वर्षणका उनका सारा कार्य रुक गया। चारों ओर जाहि-त्राहि मच गयी। चन्द्रमा भी बहुत दुःखो और चिन्तित थे। उनकी प्रार्थ...

संध्या न करने से दोष

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जिसने संध्या का ज्ञान नहीं किया, जिसने संध्या की उपासना नहीं की वह (द्विज) जीवित रहे, शूद्र-सम रहता है और मृत्यु के बाद कुत्ते आदि की योनि को प्राप्त करता है- संध्या येन न विज्ञाता संध्या येनानुपासिता । जीवमानो भवेच्छूद्रो मृतः श्वा चाभिजायते।। (दे.भाग. ११-१६-७) ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदि संध्या नहीं करें, तो वो अपवित्र है और उन्हें किसी पुण्यकर्म के करने का फल प्राप्त नहीं होता। संध्याहीनो ऽ शुचिर्नित्यमनर्हः सर्वकर्मसु। यदन्यत् कुरूते कर्म न तस्य फलभाग्भवेत्।। (दक्ष स्मृ. २-२७) सूर्य और तारों से रहित दिन-रात की संधि को तत्वदर्शी मुनियों ने संध्याकाल माना है- अहोरात्रस्य या संधिः सूर्यनक्षत्रवर्जिता। सा तु संध्या समाख्याता मुनिभिस तत्वदर्शिभिः ।। संध्यास्तुति (आचारभूषण ८९) ब्राह्मणरूपी वृक्ष का मूल संध्या है, चारों वेद, चार शाखाएँ हैं, धर्म और कर्म पत्ते हैं। अतः मूल की रक्षा यत्न से करनी चाहिये। मूल के छिन्न हो जाने पर वृक्ष और शाखा कुछ भी नहीं रह सकते- विप्रो वृक्षो मूलकान्यत संध्या  वेदाः शाखा धर्मकर्माणि पत्रम्। तस्मान्मूलं यत्नतो रक्षणीयं  छिन्ने मूले नैव वृक्षो न शाख...

भगवान् श्रीगणेश

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भगवान् श्रीगणेश भगवान् गणेशका स्वरूप अत्यन्त ही मनोहर एवं मङ्गलदायक है। वे एकदन्त और बतुर्बाहु हैं। अपने चारों हाथोंमें वे क्रमशः पाश, अङ्कुश, मोदकपात्र तथा वरमुद्रा धारण करते हैं। वे रक्तवर्ण, लम्बोदर, शुर्यकर्ण तथा पीतवस्त्रधारी हैं। वे रक्त चन्दन धारण करते हैं तथा उन्हें रक्तवर्णके पुष्प विशेष प्रिय हैं। वे अपने उपासकॉपर शीघ्र प्रसन्न होकर उनकी समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं। एक रूपमें भगवान् श्रीगणेश उमा-महेश्वरके पुत्र हैं। वे अग्रपून्य, गणोंके ईश, स्वस्तिकरूप तथा प्रणवस्वरूप हैं। उनके अनन्त नामोंमें सुमुख, एकदन्त, कपिल, गजकर्णक, लम्बोदर, विकट, विघ्ननाशक, विनायक, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचन्द्र तथा गजानन ये बारह नाम अत्यन्त प्रसिद्ध हैं। इन नामोंका पाठ अथवा श्रवण करनेसे विद्यारम्भ, विवाह, गृह-नगरोंमें प्रवेश तथा गृह-नगरसे यात्रामें कोई विघ्न नहीं होता है। भगवान् गणपतिके प्राकट्य, उनकी लीलाओं तथा उनके मनोरम विग्रहके विभिन्न रूपोंका वर्णन पुराणों और शास्त्रोंमें प्राप्त होता है। कल्पभेदसे उनके अनेक अवतार हुए हैं। उनके सभी चरित्र अनन्त हैं। पद्मपुराणके अनुसा...

लिंगाष्टकम स्तोत्र

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लिंगाष्टकम स्तोत्र  ब्रह्ममुरारिसुरार्चितलिङ्गं निर्मलभासितशोभितलिङ्गम् । जन्मजदुःखविनाशकलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥१॥ देवमुनिप्रवरार्चितलिङ्गं कामदहं करुणाकरलिङ्गम् । रावणदर्पविनाशनलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥२॥ सर्वसुगन्धिसुलेपितलिङ्गं बुद्धिविवर्धनकारणलिङ्गम् । सिद्धसुरासुरवन्दितलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥३॥ कनकमहामणिभूषितलिङ्गं फणिपतिवेष्टितशोभितलिङ्गम् । दक्षसुयज्ञविनाशनलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥४॥ कुङ्कुमचन्दनलेपितलिङ्गं पङ्कजहारसुशोभितलिङ्गम् । सञ्चितपापविनाशनलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥५॥ देवगणार्चितसेवितलिङ्गं भावैर्भक्तिभिरेव च लिङ्गम् । दिनकरकोटिप्रभाकरलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥६॥ अष्टदलोपरिवेष्टितलिङ्गं सर्वसमुद्भवकारणलिङ्गम् । अष्टदरिद्रविनाशितलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥७॥ सुरगुरुसुरवरपूजितलिङ्गं सुरवनपुष्पसदार्चितलिङ्गम् । परात्परं परमात्मकलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥८॥ लिङ्गाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेत् शिवसन्निधौ। शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते॥

श्री गणेश पंच रत्न स्तोत्र!

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श्री गणेश पंच रत्न स्तोत्र! मुदा करात्त मोदकं सदा विमुक्ति साधकम् । कलाधरावतंसकं विलासिलोक रक्षकम् । अनायकैक नायकं विनाशितेभ दैत्यकम् । नताशुभाशु नाशकं नमामि तं विनायकम् ॥ 1 ॥ नतेतराति भीकरं नवोदितार्क भास्वरम् । नमत्सुरारि निर्जरं नताधिकापदुद्ढरम् । सुरेश्वरं निधीश्वरं गजेश्वरं गणेश्वरम् । महेश्वरं तमाश्रये परात्परं निरन्तरम् ॥ 2 ॥ समस्त लोक शङ्करं निरस्त दैत्य कुञ्जरम् । दरेतरोदरं वरं वरेभ वक्त्रमक्षरम् । कृपाकरं क्षमाकरं मुदाकरं यशस्करम् । मनस्करं नमस्कृतां नमस्करोमि भास्वरम् ॥ 3 ॥ अकिञ्चनार्ति मार्जनं चिरन्तनोक्ति भाजनम् । पुरारि पूर्व नन्दनं सुरारि गर्व चर्वणम् । प्रपञ्च नाश भीषणं धनञ्जयादि भूषणम् । कपोल दानवारणं भजे पुराण वारणम् ॥ 4 ॥ नितान्त कान्ति दन्त कान्ति मन्त कान्ति कात्मजम् । अचिन्त्य रूपमन्त हीन मन्तराय कृन्तनम् । हृदन्तरे निरन्तरं वसन्तमेव योगिनाम् । तमेकदन्तमेव तं विचिन्तयामि सन्ततम् ॥ 5 ॥ महागणेश पञ्चरत्नमादरेण योऽन्वहं । प्रजल्पति प्रभातके हृदि स्मरन् गणेश्वरम् । अरोगतामदोषतां सुसाहितीं सुपुत्रताम् । समाहितायु रष्टभूति मभ्युपैति सोऽचिरात् ॥ 6 ...

ऋणविमोचन महागणपति स्तोत्र

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विनियोग – अस्य श्रीऋणविमोचनमहागणपतिस्तोत्रमन्त्रस्य शुक्राचार्य ऋषि:, ऋणविमोचन महागणपतिर्देवता, अनुष्टुप छन्द:, ऋणविमोचनमहागणपतिप्रीत्यर्थे जपे विनियोग: ।   ऊँ स्मरामि देवदेवेशं वक्रतुण्डं महाबलम । षडक्षरं कृपासिन्धुं नमामि ऋणमुक्तये ।।1।। महागणपतिं वन्दे महासेतुं महाबलम । एकमेवाद्वितीयं तु नमामि ऋणमुक्तये ।।2।। एकाक्षरं त्वेकदन्तमेकं ब्रह्म सनातनम । महाविघ्नहरं देवं नमामि ऋणमुक्तये ।।3।। शुक्लाम्बरं शुक्लवर्णं शुक्लगंधानुलेपनम । सर्वशुक्लमयं देवं नमामि ऋणमुक्तये ।।4।। रक्ताम्बरं रक्तवर्णं रक्तगंधानुलेपनम । रक्तपुष्पै: पूज्यमानं नमामि ऋणमुक्तये ।।5।। कृष्णाम्बरं कृष्णवर्णं कृष्णगंधानुलेपनम । कृष्णयज्ञोपवीतं च नमामि ऋणमुक्तये ।।6।। पीताम्बरं पीतवर्णं पीतगंधानुलेपनम । पीतपुष्पै: पूज्यमानं नमामि ऋणमुक्तये ।।7। सर्वात्मकं सर्ववर्णं सर्वगन्धानुलेपनम । सर्वपुष्पै: पूज्यमानं नमामि ऋणमुक्तये ।।8।। एतदृणहरं स्तोत्रं त्रिसन्ध्यं य: पठेन्नर: । षण्मासाभ्यन्तरे तस्य ऋणच्छेदो न संशय: ।।9।। सहस्त्रदशकं कृत्वा ऋणमुक्तो धनी भवेत ।।10।।

जय अम्बे गौरी दुर्गा आरती

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी । तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी ॥ ॐ जय अम्बे गौरी..॥ मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को । उज्ज्वल से दोउ नैना, चंद्रवदन नीको ॥ ॐ जय अम्बे गौरी..॥ कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै । रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजै ॥ ॐ जय अम्बे गौरी..॥ केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी । सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी ॥ ॐ जय अम्बे गौरी..॥ कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती । कोटिक चंद्र दिवाकर, सम राजत ज्योती ॥ ॐ जय अम्बे गौरी..॥ शुंभ-निशुंभ बिदारे, महिषासुर घाती । धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती ॥ ॐ जय अम्बे गौरी..॥ चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे । मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे ॥ ॐ जय अम्बे गौरी..॥ ब्रह्माणी, रूद्राणी, तुम कमला रानी । आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी ॥ ॐ जय अम्बे गौरी..॥ चौंसठ योगिनी मंगल गावत, नृत्य करत भैरों । बाजत ताल मृदंगा, अरू बाजत डमरू ॥ ॐ जय अम्बे गौरी..॥ तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता, भक्तन की दुख हरता । सुख संपति करता ॥ ॐ जय अम्बे गौरी..॥ भुजा चार अति शोभित, वर मुद्रा धारी । [खड्ग खप्पर धारी] मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी ॥ ॐ ज...