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श्रीऋणमोचनमहागणपतिस्तोत्रं
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अस्य श्रीऋणमोचनमहागणपतिस्तोत्रस्य शुक्राचार्य ऋषिः, अनुष्टुपच्छन्दः श्रीऋणमोचक महागणपतिर्देवता। मम ऋणमोचनमहागणपतिप्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ॥ रक्ताङ्गं रक्तवस्त्रं सितकुसुमगणैः पूजितं रक्तगन्धैः क्षीरब्धौ रत्नपीठे सुरतरुविमले रत्नसिंहासनस्थम्। दोर्भिः पाशाङ्कुशेष्ठाभयधर्मतुलं चन्द्रमौलिं त्रिनेत्रं ध्यायेत् शान्त्यर्थमिशं गणपतिमामलं श्रीसमेतं शोभाम् ॥ स्मरामि देव देवेशं वक्रतुण्डं महाबलम्। षडाक्षरं कृपासिंधुं नमामि ऋणमुक्तये ॥ ॥ एकाक्षरं ह्येकदन्तमेकं ब्रह्म सनातनम्। एकमेवाद्वितीयं च नमामि ऋणमुक्तये ॥ 2॥ महागणपतिं देवं महासत्वं (महासेतुं) महाबलम्। महाविघ्नहरं शंभोः नमामि ऋणमुक्तये ॥ 3॥ (शुक्लाम्बरं शुक्लवर्णं शुक्लगन्धानुलेपनम्। सर्वशुक्लमयं देवं नमामि ऋणमुक्तये ॥4॥) कृष्णाम्बरं कृष्णवर्णं कृष्णगन्धानुलेपनम्। कृष्णसरपोपवीतं च नमामि ऋणमुक्तये ॥ 4॥ (कृष्णयज्ञोपवीतं) रक्ताम्बरं रक्तवर्णं रक्तगंधानुलेपनम्। रक्तपुष्पप्रियं देवं नमामि ऋणमुक्तये ॥ 5॥ (रक्तपुष्पयः पूज्यमानं) पीताम्बरं पीतवर्णं पीतगन्धानुलेपनम्। पीतपुष्पप्रियं देवं नमामि ऋणमुक्तये ॥ 6॥ (पीतपुष्पयः पूज्यम...
पटना में वैदिक पंडित
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पटना शहर के सभी क्षेत्रों में हवन, पूजा के लिए वैदिक पंडित ढूंढना बहुत मुश्किल होता है पटना में वैदिक पंडित- एस्ट्रोशिव सभी प्रकार की पूजा, हवन, शांति यज्ञ, संस्कार, गृहप्रवेश पूजा, वास्तु शांति पूजा, गृह प्रवेश पूजा, गायत्री मंत्र जाप और पटना में महामृत्युंजय मंत्र जाप आदि सभी पूजा और कर्मकांड के लिए वैदिक पंडित से संपर्क कर सकते हैं कृपया हमारी हेल्पलाइन पर कॉल करें या आप " बुक योर पंडित फॉर्म " भरकर भी वैदिक पंडित पटना बुक कर सकते हैं । हवन गृहप्रवेश विवाह के लिए पंडित पटना में हवन के लिए हमारे अनुभवी वैदिक पंडित उचित मूल्य पर और बिना किसी परेशानी के सामग्री सहित आपकी सटीक और अनुकूलित धार्मिक ज़रूरतों को पूरा करते हैं। पटना में हवन के लिए वैदिक पंडित ढूँढ़ने का यह एक आसान तरीका है। हम आपको पटना में गृहप्रवेश पूजा के लिए वैदिक पंडित बहुत ही उचित दक्षिणा पर उपलब्ध कराते हैं । बस हमारे मोबाइल नंबर / त्वरित पूछताछ फ़ॉर्म पर हमसे संपर्क करें, हम आपको हमारे द्वारा उपलब्ध सेवाओं की विस्तृत जानकारी देंगे। हम आपकी सुविधानुसार धार्मिक पूजा कराने में विशेषज्ञ हैं। आर्य समाज प...
ओम जय जगदीश हरे , स्वामी! VishnuJi ki Aarti Om jai Jagdish Hare
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जय जगदीश हरे। . भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ ओम जय जगदीश हरे। . जो ध्यावे फल पावे, दुःख विनसे मन का। स्वामी दुःख विनसे मन का। . सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥ ओम जय जगदीश हरे। . मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं मैं किसकी। स्वामी शरण गहूं मैं किसकी। . तुम बिन और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ओम जय जगदीश हरे। . तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी। स्वामी तुम अन्तर्यामी। . पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ओम जय जगदीश हरे। . तुम करुणा के सागर, तुम पालन-कर्ता। स्वामी तुम पालन-कर्ता। . मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ओम जय जगदीश हरे। . तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति। स्वामी सबके प्राणपति। . किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय जगदीश हरे। . दीनबन्धु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे। स्वामी तुम ठाकुर मेरे। . अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ओम जय जगदीश हरे। . विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा। स्वमी पाप हरो देवा। . श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ओम जय जगदीश हरे। . श्री जगदीशजी की आरती, जो कोई नर गावे। स्वामी जो कोई नर गावे। . कहत शिवानन्द स्वामी, सुख संपत्ति पावे॥ ओम जय जगदीश हरे। . ...
अग्नि की उत्पति कैसे हुई
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अग्निदेवता यज्ञके प्रधान अङ्ग हैं। ये सर्वत्र प्रकाश करनेवाले एवं सभी पुरुषार्थोंको प्रदान करनेवाले हैं। सभी रत्र अग्निसे उत्पन्न होते हैं और सभी रत्नोंको यही धारण करते हैं। वेदोंमें सर्वप्रथम ऋग्वेदका नाम आता है और उसमें प्रथम शब्द अग्रि ही प्राप्त होता है। अतः यह कहा जा सकता है कि विश्व-साहित्यका प्रथम शब्द अग्रि ही है। ऐतरेय आदि ब्राह्मणग्रन्थोंमें यह बार-बार कहा गया है कि देवताओंमें प्रथम स्थान अग्रिका है। आचार्य यास्क और सायणाचार्य ऋग्वेदके प्रारम्भमें अग्निकी स्तुतिका कारण यह बतलाते हैं कि अग्रि ही देवताओंमें अग्रणी हैं और सबसे आगे-आगे चलते हैं। युद्धमें ये सेनापतिका काम करते हैं। इन्हींको आगे कर युद्ध करके देवताओंने असुरोंको परास्त किया था। पुराणोंके अनुसार इनकी पत्नी स्वाहा हैं। ये सब देवताओंके मुख हैं और इनमें जो आहुति दी जाती है, वह इन्हींके द्वारा देवताओंतक पहुँचती है। केवल ऋग्वेदमें अग्निके दो सौ सूक्त प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेदमें भी इनकी स्तुतियाँ प्राप्त होती कहते हैं कि हैं। ऋग्वेदके प्रथम सूक्तमें अग्निकी प्रार्थना...
१. श्रीसोमनाथ
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१. श्रीसोमनाथ यह ज्योतिर्लिङ्ग सोमनाथ नामक विश्वप्रसिद्ध मन्दिरमें स्थापित है। यह मन्दिर गुजरात प्रान्तके ठियावाड़ क्षेत्रमें समुद्र के किनारे स्थित है। पहले यह क्षेत्र प्रभामक्षेत्रके नामसे जाना जाता था। यहीं भगवान् श्रीकृष्णाने जग नामक व्याधके बाणको निमित्त बनाकर अपनी लीलाका संवरण किया था। यहाँके ज्योतिर्लिङ्गकी कथा पुराणोंमें इस प्रकार दी हुई है दक्ष प्रजार्थकी सत्ताईस कन्याएँ थीं। उन सभीका विवाह चन्द्र देवताके साथ हुआ था। किन्तु चन्द्रमाका समस्त अनुराग उनमें एक केवल रोहिणीके प्रति ही रहता था। उनके इस कार्यसे दक्ष प्रजापतिकी अन्य कन्याओंको बहुत कष्ट रहता था। उन्होंने अपनी यह व्यथा कथा अपने पिताको सुनायी। दक्ष प्रजापतिले उसके लिये चन्द्रदेवको बहुत प्रकारसे समझाया। किन्तु रोहिणीके वशीभूत उनके हृदयपर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। अन्ततः दक्षने कुद्ध होकर उन्हें क्षयी हो जानेका शाप दे दिया। इम शापके कारण चन्द्रदेव तत्कायन क्षय हो गये। उनके क्षयग्रस्त होते ही पृथ्वीपर सुधा शीतलता वर्षणका उनका सारा कार्य रुक गया। चारों ओर जाहि-त्राहि मच गयी। चन्द्रमा भी बहुत दुःखो और चिन्तित थे। उनकी प्रार्थ...
संध्या न करने से दोष
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जिसने संध्या का ज्ञान नहीं किया, जिसने संध्या की उपासना नहीं की वह (द्विज) जीवित रहे, शूद्र-सम रहता है और मृत्यु के बाद कुत्ते आदि की योनि को प्राप्त करता है- संध्या येन न विज्ञाता संध्या येनानुपासिता । जीवमानो भवेच्छूद्रो मृतः श्वा चाभिजायते।। (दे.भाग. ११-१६-७) ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदि संध्या नहीं करें, तो वो अपवित्र है और उन्हें किसी पुण्यकर्म के करने का फल प्राप्त नहीं होता। संध्याहीनो ऽ शुचिर्नित्यमनर्हः सर्वकर्मसु। यदन्यत् कुरूते कर्म न तस्य फलभाग्भवेत्।। (दक्ष स्मृ. २-२७) सूर्य और तारों से रहित दिन-रात की संधि को तत्वदर्शी मुनियों ने संध्याकाल माना है- अहोरात्रस्य या संधिः सूर्यनक्षत्रवर्जिता। सा तु संध्या समाख्याता मुनिभिस तत्वदर्शिभिः ।। संध्यास्तुति (आचारभूषण ८९) ब्राह्मणरूपी वृक्ष का मूल संध्या है, चारों वेद, चार शाखाएँ हैं, धर्म और कर्म पत्ते हैं। अतः मूल की रक्षा यत्न से करनी चाहिये। मूल के छिन्न हो जाने पर वृक्ष और शाखा कुछ भी नहीं रह सकते- विप्रो वृक्षो मूलकान्यत संध्या वेदाः शाखा धर्मकर्माणि पत्रम्। तस्मान्मूलं यत्नतो रक्षणीयं छिन्ने मूले नैव वृक्षो न शाख...